मला हिंदी लिहीता नाही येत; पण सहज काही तोडक्या मोड्क्या आल्या ओळी
त्या तुला अर्पण........
ना मंजिल हॆ, सुहाना सफ़र हॆ..सुकुन हॆ दूर तक
ना मेरी कॊम हॆ कुछ...ना मेरा मुझसे रिश्ता हॆ कुछ
सुना हॆ अब उसका भी कोइ ऒर हुवा हॆ हमसफ़र
ना मेरि रफ़्तार मे था, ना अब पडा हॆ फ़र्क कुछ
चलना हॆ फ़ितरत.. ना आये थे.. न मर्जी थी अपनी कभी
बहोत हुवी मुश्किल समझके कि ना करनी थी आरजू कुछ
ना जाने कितनी मिलोंका फ़ासला करना हॆ तॆ मुनासीब
बस चलना हॆ इसी अमल पर रहे, ना होता हासील कुछ
ना थी कभी किसिकी खोज, ना किसी शब-ए-रोज का चांद था
चल पडा तो पुरा था, ढला कितना... ऒर बाकी कुछ कुछ...
Tuesday, December 11, 2007
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